उजाले की ओर –संस्मरण

प्रिय मित्रो!   हर बार की भाँति यह वर्ष भी चला गया। कितना खोया, कितना पाया, कोई हिसाब नहीं। जीवन गणित नहीं है जो दो दुनी चार कर दो और आगे बढ जाओ। जीवन को जीने के लिए उसके साथ चलना होता है, उसमें डूबना पड़ता है, उसके साथ रुकना पड़ता है फिर यात्रा शुरु करनी होती है। इसी प्रकार रुकते, चलते जीवन कगार पर आ लगता है। बीती ताहि बिसार दे,आगे की सुध ले के अनुसार दुखद स्मृतियों को भुलाकर आगे बढना ही जीवन को जीने का स्वस्थ तरीका है। मित्रो!इस  नव वर्ष में आपके जीवन में नई पहल