रघुवंशी हवेली में नियम पत्थर की लकीरों जैसे थे—दिखते नहीं थे, पर हर साँस में महसूस होते थे।और अब…वो लकीरें धीरे-धीरे मिट रही थीं।कार्तिक और संस्कृति दोनों ने मिलकर घर के नियम तोड़ दिए थे।बिना आवाज़। बिना ऐलान। बिना किसी को बताए।इस घर को अब भी लगता था, सब वैसा ही है। पर एक कमरा झूठ बोल रहा था।जैसे ही घर की लाइटें बुझतीं—कार्तिक संस्कृति के और करीब आ जाता।कार्तिक (मुस्कुराकर) बोला - दिन भर कितनी चुप रहती हो…थक नहीं जाती?संस्कृति उसके सीने पर सिर रखकर धीरे से बोलती—आपके पास आकर सब ठीक हो जाता है।कार्तिक उसे बच्चों की तरह चिढ़ाता।