पक्षीलोक की सुबह आज कुछ अलग थी।आकाश सामान्य से अधिक उजला था, हवाओं में हल्की सी मिठास थी, और महल के ऊँचे शिखरों पर बैठे पक्षी बिना कारण ही मधुर स्वर में गा रहे थे।रानी एकांक्षी महल की बालकनी में खड़ी थीं।उनकी हथेलियाँ अनायास ही अपने उदर पर जा टिकीं।दिल की धड़कनें आज कुछ तेज़ थीं…जैसे भीतर कोई नई हलचल जन्म ले रही हो।“अधिराज…”उनके होंठों से अनजाने में ही नाम फिसल गया।अधिराज, जो कुछ ही दूरी पर अपने पंखों को समेटे खड़े थे, उनकी आवाज़ सुनकर तुरंत उनकी ओर बढ़े।“क्या हुआ एकांक्षी?”उनकी आवाज़ में वही पुराना अपनापन था, वही सुरक्षा।एकांक्षी