गाँव की पगडंडी पर धूल उड़ रही थी। सूरज ढलने को था, लेकिन हवा में एक अजीब सी तपन थी। माधव अपनी पुरानी साइकिल रोके खड़ा था। सामने खलिहान में पंचायत बैठी थी। सन्नाटा ऐसा कि सूखे पत्तों के गिरने की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे।"माधव, तू पागल हो गया है क्या?" मुखिया जी की कड़क आवाज़ ने ख़ामोशी तोड़ी।माधव ने अपनी साइकिल का स्टैंड लगाया और धीरे से आगे बढ़ा, "मुखिया जी, पागलपन की बात नहीं है। बस ये पूछ रहा हूँ कि इस बेज़ुबान का कसूर क्या है?"मुखिया जी ने अपने अंगोछे से माथा पोंछा और पास बैठे