अगली सुबह जैसे ही सूरज ने आँगन पर हल्की किरणें डालीं, चित्रा ने अपनी आँखें खोलीं। रात भर का दर्द आँखों के नीचे बैठा था, पर चेहरे पर अब भी वही शांत, संयमित मुस्कान थी। वह धीरे से उठी, अपने आँचल को ठीक किया और बाहर आँगन में आ गई। सामने तुलसी चौरा था। हल्की हवा में उसकी पत्तियाँ झूम रही थीं।उधर बगल वाले घर से कदमों की आहट आई।जेठानी।उसकी नज़र जैसे ही चित्रा पर पड़ी, होंठों पर एक बनावटी मुस्कान आ गई।“तो बहूरानी… कैसी रही रात?”आवाज़ में मीठा ज़हर था।चित्रा ने कुछ पल के लिए उसकी ओर देखा, फिर