विवेक – अदिति | गहरा रिश्तारात का सन्नाटा चारों ओर फैला था।घर सो चुका था… लेकिन अदिति की आँखों में नींद नहीं थी।छत पर बैठी वो आसमान देख रही थी।तारों के बीच कहीं उसे अपना डर भी दिख रहा था।तभी पीछे से परिचित-सी आवाज़ आई—“अब से छत पर अकेले नहीं बैठा करो।”अदिति ने बिना पलटे कहा—“जानती थी… तुम आओगे।”विवेक पास आकर बैठ गया।दोनों के बीच बस एक हाथ का फासला था।“तुम्हें पता है,”विवेक ने धीरे से कहा,“जब तुम्हें उस दिन बेहोश देखा था…मुझे लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया रुक गई हो।”अदिति ने पहली बार अपनी कमजोरी जाहिर की—“और मुझे