आदित्य – चेताक्क्षी | सोलफुल रिश्तामंदिर में धूप और अगरबत्ती की खुशबू फैली थी।चेताक्क्षी दीपक जला रही थी।आदित्य उसे दूर से देख रहा था—शांत, मजबूत, और बेहद सुकून देने वाली।“तुम्हें डर नहीं लगा?”आदित्य ने पूछा।चेताक्क्षी मुस्कुराई।“डर था… लेकिन विश्वास ज़्यादा था।”“किस पर?”“तुम पर… और किस्मत पर।”आदित्य कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—“मेरी ज़िंदगी में बहुत फैसले दूसरों ने लिए…पहली बार है जब कोई फैसला सही लग रहा है।”चेताक्क्षी ने उसकी तरफ देखा—“तो फिर साथ निभाओगे?”आदित्य ने बिना देर किए कहा—“जब तक साँस है।”दोनों की नज़रें मंदिर की घंटी के साथ एक हो गईं।उसी रात…चारों पैहरगढ़ से दूर, पहाड़ों के पीछे—काली