आजाद सवेरा

 कोहरे की चादर ने पूरी घाटी को ढका हुआ था। दूर कहीं से आती हुई झरनों की आवाज सन्नाटे को और गहरा बना रही थी। एक पुरानी लकड़ी की चौकी, जिसकी दीवारें समय की मार से काली पड़ चुकी थीं, वहां दो साये आमने-सामने बैठे थे। मेज पर एक पुराना लालटेन जल रहा था, जिसकी कम रोशनी में केवल चेहरे के हाव-भाव ही नजर आ रहे थे।मेजर विक्रम ने अपनी चाय का मग टेबल पर रखा और सामने बैठे नौजवान आर्यन की तरफ देखा।"तो, तुम तैयार हो आर्यन?" विक्रम की आवाज में एक भारीपन था।आर्यन ने अपनी बंदूक के बोल्ट