आज़मी साहब मीठा नहीं खाते

संदीप अवस्थी कई बार लगता है कि धर्म को हम चलाते हैं। पर ऐसा है नहीं दरअसल धर्म मजहब हमें चला रहा होता है। यह तो जगजाहिर  है कि मनुष्य पहले या धर्म पहले?  तो फिर कुछ लोग इसका उल्टा मतलब क्यों इस्तेमाल करते हैं? और साफ-साफ कहें तो कठमुल्ला, बड़े पहुंचे हुए आलिम फाजिल धार्मिक लोग इस अज्ञानता से हमें गुमराह करते हैं। हम पढ़े लिखे होने के बाद भी कुछ नहीं कहते। अच्छे मजहब और लोकतंत्र में बहस,चिंतन ,विवेचन के लिए जगह होनी चाहिए। तभी  हम अपने धर्म को आगे ले जा पाएंगे। अन्यथा सदी आधी बीत जाएगी