शून्य की यात्रा — न सत्य, न असत्य जीवन में न कुछ अंतिम सत्य है,न कुछ अंतिम असत्य।दुःख और सुखकोई शत्रु–मित्र नहीं—वे तो जीवन के दाएँ–बाएँ कदम हैं।कभी दुःख में खड़े रहने की हिम्मत आ जाए,तो वही दुःखअपने आप सुख में बदल जाता है।और जिस सुख को पकड़ लिया,वह उसी क्षणअस्थायी हो जाता है।1. सुख–दुःख का चक्रसुख और दुःखजीवन के पहिए के दो तीलें हैं।एक को काट दोगे—तो पहिया चलेगा ही नहीं।इसलिए मुक्तिसुख से भागना नहीं,दुःख से लड़ना नहीं—बल्कि दोनों से मुक्त होना है। 2. शून्य से शून्य तक हम 0 से आते हैंऔर 0 की ओर लौटते