वेदान्त 2.0 - भाग 34

काल, अंधकार और शून्य : मनुष्य का दोष कहाँ है उपनिषद वेद–काल की बात नहीं करते। वे किसी युग, किसी घटना, किसी परिवर्तन की घोषणा नहीं हैं।वे तो शाश्वत सत्य की ओर संकेत हैं —उस सत्य की, जो काल से पहले भी था और काल के बाद भी रहेगा।गीता अलग है।गीता काल–परिवर्तन की घोषणा है।गीता उस संधि–क्षण की वाणी हैजहाँ एक युग समाप्त होता हैऔर दूसरा आरम्भ होता है।और हर युग–परिवर्तन मेंसिर्फ राजनीतिक या सामाजिक संरचनाएँ नहीं बदलतीं,ज्ञान की प्रकृति भी बदलती है।कृष्ण केवल धर्मोपदेशक नहीं हैं।वे काल–चेतना का अवतार हैं।परम पुरुष का वह रूपजो यह जानता है कियदि उस