स्त्री को किसी भी पाखंडी की शरण नहीं जाना है। क्योंकि स्त्री की शरण बाहर नहीं—उसकी शरण बोध है। असली स्त्री केवल प्रेम का बोध लेती है।ना समझ मूर्ख स्त्री या पुरुष स्वभाव वाली स्त्री धार्मिक पुरुष के शरण जाती है लेकिन यह पुरुषको गुरु मान लेना स्त्री का धर्म नहीं है।और जब कोई गुरु स्त्री को समझता है तब शरण झुकने नहीं देता है।बस दोनों रक दूसरे के भीतर बोध करता है।स्त्री पुरुष एक मेत्री है, गुरु शिष्य नहीं।स्त्री और पुरुष — दो शरीर नहीं, दो धाराएँ हैं।स्त्री के भीतरयदि संवेदना और स्त्रीत्व जीवित है—तभी वहसामने खड़े पुरुष केस्वभाव,