आत्मसाक्षात व्यक्ति का धर्म जब कोई व्यक्ति आत्मसाक्षात हो जाता है —संत होता है, महात्मा होता है,ब्रह्म में लीन होता है —तो उसके जीवन का केवल एक ही धर्म रह जाता है:दूसरे को आत्मतत्व की ओर संकेत देना।न संस्था,न संगठन,न सेवा-योजना,न सदस्यता।उसका कार्य व्यवस्था बनाना नहीं,उसका कार्य ब्रह्म का बोध देना है।आज यदि कोई संत IT इंजीनियर है, PhD है,तो वह आध्यात्मिक विज्ञान कोउसी प्रकार सरल कर सकता हैजैसे विज्ञान पानी को समझाता है—पानी = दो हाइड्रोजन + एक ऑक्सीजन।उसी तरह आत्मा, चेतना, सत्य, परमात्माको भी सूत्रों, तर्क और स्पष्टता मेंसमझाया जा सकता है।क्योंकि वेद उपनिषद गीता सब