श्रापित एक प्रेम कहानी - 41

वर्शाली अपनी आंखें पोंछती हूई कहती है--- अब मैं क्या करू एकांश जी मुझे अपनी बहन को भी बचाना है और आपको भी पाना है। क्योंकी अब मैं आपकी हो चुकी हूं एकांश जी । आपकी हो चुकी हूं। इतना बोलकर वर्शाली एकांश के शरीर मे लगे घांव को छूती है जिससे एकांश को दर्द महसूस होती है और एकांश निंद से उठ जाता है। एकांश देखता है के वर्शाली उसके पास खड़ी है जिसे दैख कर एकांश का चेहरा खुशी से लाल हो जाता है। एकांश खुश होकर वर्शाली के दोनो हाथ पकड़ लेता है और अपनी और खींच कर वर्शाली