गांव का नाम था सरसौली। नाम में मिठास थी, पर ज़मीन में जहर भरा था। बाहर से यह गांव शांत, हरा-भरा और संस्कारी लगता था, लेकिन भीतर से यह एक खोखला समाज था—जहां इंसान की कीमत उसकी जाति से तय होती थी, उसके कर्म से नहीं।सरसौली में मंदिर सबके लिए था, पर भगवान सबके नहीं। कुआं सबके सामने था, पर पानी सबका नहीं। स्कूल की घंटी सबके लिए बजती थी, पर सपने सबके लिए नहीं।इसी गांव में रहती थी सावित्री—एक दलित परिवार की बेटी। उसके पिता रामदीन चमड़े का काम करते थे, मां खेतों में मजदूरी। मिट्टी की झोपड़ी, फटी