पिंजरे के बाहर का आकाश

शहर की चकाचौंध से दूर एक मध्यमवर्गीय अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी अदिति अपनी कॉफी के कप से उठती भाप को देख रही थी। सुबह के सात बज रहे थे। घर में शांति थी, लेकिन उसके भीतर एक शोर मचा हुआ था। यह शोर उन अनकहे शब्दों का था जो पिछले दस सालों से उसके गले में अटके हुए थे। अदिति एक सफल आर्किटेक्ट थी, या कम से कम शादी से पहले तो थी ही। अब वह एक 'कुशल गृहिणी' थी, जो इस बात पर गर्व महसूस करने के लिए मजबूर की जाती थी कि उसने अपने करियर का 'त्याग'