भाग 1: बचपन की शुरुआतमेरा नाम आदित्य है। मैं हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में जन्मा और पला-बढ़ा।हमारा घर छोटा था, लेकिन उसमें एक बड़ी दुनिया बसती थी — किताबों की दुनिया।पिता जी सरकारी स्कूल में हिंदी के अध्यापक थे। उनके कमरे में कदम रखते ही एक अलग-सी खुशबू महसूस होती थी — पुराने पन्नों, स्याही और लकड़ी की अलमारी की। दीवार से सटी तीन बड़ी अलमारियाँ थीं जिनमें सैकड़ों किताबें रखी थीं — ‘गोदान’, ‘राग दरबारी’, ‘गीतांजलि’, ‘Discovery of India’, और न जाने कितनी पत्रिकाएँ।जब दूसरे बच्चे गिल्ली-डंडा या क्रिकेट में मग्न रहते, मैं अक्सर उन अलमारियों