प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम

"प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम"​"सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए क्या प्यार की बलि देना ज़रूरी है?"​पर समय का पहिया घूमता है और हिसाब बराबर करने के लिए वापस आता है।"नागेंद्र के लिए यह किसी सपने से कम न था। वर्षों बाद सुलोचना का यूँ अचानक सामने आ जाना उसकी कल्पना से परे था। वह दौर याद आया जब इंटरव्यू में मिलती असफलताओं ने उसे तोड़ दिया था और एक सुरक्षित भविष्य की खातिर उसने सुलोचना को बिना बताए छोड़कर अपर्णा से विवाह कर लिया था। आज दिल्ली की इस भीड़ में, दस साल बाद सुलोचना का साक्षात् चेहरा देखकर