बारिश की पहली बूंदेंदिल्ली की गर्मियां हर साल की तरह इस बार भी बेहद बेरहम थीं। सूरज जैसे आसमान से आग बरसा रहा था। दोपहर के वक्त सड़कों पर निकलना किसी सज़ा से कम नहीं था। हवा में तपिश थी, धूल थी और लोगों के चेहरों पर थकान साफ दिखाई देती थी।नेहा अपनी छोटी-सी बालकनी में खड़ी थी। हाथ में चाय का कप था, लेकिन चाय कब ठंडी हो गई, उसे पता ही नहीं चला। उसकी नजरें सामने की इमारतों से होते हुए नीचे सड़क पर टिक गई थीं। वही रोज़ का शोर, वही भागती ज़िंदगी और वही अकेलापन।पिछले तीन