उम्मीद की एक नई किरण

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शहर की भीड़भाड़ से दूर, एक पुराने जर्जर मकान की बालकनी में बैठे अविनाश के चेहरे पर गहरी चिंता की लकीरें खिंची हुई थीं। उसके हाथ में एक लिफाफा था, जिसे वह बार-बार खोलता और फिर बंद कर देता। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कोई समुद्र अपनी लहरों को बांधने की कोशिश कर रहा हो। तभी अंदर से उसकी पत्नी ममता की आवाज़ आई।ममता: "अविनाश, चाय ठंडी हो रही है। कब तक वहाँ बैठे रहोगे? क्या सोच रहे हो?"अविनाश ने एक लंबी सांस ली और अंदर आते हुए बोला, "कुछ नहीं ममता, बस सोच रहा था