घर जो कभी बेचा नहीं गयाशहर के सबसे चमकदार इलाके में, जहां हर तरफ़ गगनचुंबी इमारतें आसमान को चीर रही थीं, वो एक पुराना सा घर अकेला खड़ा था।चारों ओर कांच की दीवारें, नीली रोशनी वाली बालकनियां, और लग्ज़री कारों की कतारें।बीच में वो घर – टूटी-फूटी खिड़कियां, दीवारों पर उखड़ी पेंट, और छत पर जंग लगी टिन की चादर।लोग गुजरते हुए मुस्कुराते, फुसफुसाते –“मालिक पागल है यार। करोड़ों की ज़मीन छोड़ रखी है। बस बेच दे तो अमीर हो जाए।”कोई कहता, “शायद कोई कानूनी पचड़ा है।”कोई हंसता, “या फिर भूतों का घर है।”लेकिन किसी ने कभी उसका दरवाजा खटखटाने