बुराड़ी घाट का युद्ध: स्वराज्य के लिए अंतिम बलिदान जनवरी 1760 का कड़कड़ाती ठंड वाला पौष महीना। यमुना नदी के किनारे बुराड़ी घाट (बारारी घाट) पर घना कोहरा छाया हुआ था। नदी का पानी कम हो चुका था, जिससे छोटे-छोटे द्वीप और ऊँची घास की आड़ में छिपना आसान था। मराठा सेना, दत्ताजी राव शिंदे (सिंधिया) के नेतृत्व में, दिल्ली की रक्षा के लिए यमुना के इस पार डटी हुई थी। उनके साथ मात्र कुछ हजार सैनिक थे – मुख्य रूप से घुड़सवार और तलवारबाज। तोपखाना पीछे छूट गया था, क्योंकि समय नहीं मिला था उसे साथ लाने का।