( 42 )"पछचाताप कहानी " एक मर्मिक जज्बाती हो कर आपने लवारिस पन के गुमनाम दृश्य की यादगार डलिवरी बॉय की ही बेजोड़ तकसीम से निकली क़लम से सत्य माफिक है। किसी पे ये कहानी लगती हो तो इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं ले रहा हूँ। ये दुपहर का वक़्त था। सर्दी थी, महीना फ़रवरी की शुरवात कहिये... चावल खा रहा मोहन रविवार को छत पे बैठा था। सोच रहा था जो पैकट उसके पास था