ऐसा ही होता है

ऐसा ही होता है दिन भर मशीन की गड़गड़ और घर की चख-चख से बड़ी दुर, गंदा नाला के उपर ब्रीज पर बैठना ज्ञान को बड़ा सुखद अनुभूति देता था। वह अपने नाक पे, श्वास पे तो अत्चाचार बर्दाश्त कर सकता था मगर मन-मस्कि पर कुठाराघात सहना उसके बूते के बाहर की बात थी। वो उस पुल पर अकेला नहीं बैठता था बल्कि उसके तरह और भी लोग थे जो उस दुर्गंध के अभयस्त थे। शुकून की अनुभूति सुगंध भी प्रतीत कराती थी।दस रूपया जिसको कि वो अपने पारिवारिक खर्च से बचाकर रखता, चना खाने में खर्च करता था। चना