प्रस्तावनायह पुस्तक किसी को सही ठहराने या गलत सिद्ध करने के लिए नहीं लिखी गई। यह न जीवन को सुधारने का दावा करती है, न किसी लक्ष्य तक पहुँचाने का वादा। यह पुस्तक केवल एक बात को साफ़ देखती है— मनुष्य दुखी इसलिए नहीं है कि जीवन कठिन है, बल्कि इसलिए कि वह जीवन के साथ संतुलन में नहीं चल रहा। कभी वह डर, लालच और भविष्य की चिंता में अंधी दौड़ में लगा रहता है। और कभी थककर किसी एक स्थिति, विचार या अनुभव में रुक जाता है। इन दोनों के बीच जीवन छूट जाता है। यह पुस्तक उसी