संस्कृति अब वर्क फ्रॉम होम में नहीं… बल्कि नियमों के बीच काम करने लगी थी। अकेलापन अब सिर्फ़ घर तक सीमित नहीं था। वो उसके साथ ऑफिस तक चला जाता।सुबह-सुबह सास की आवाज़ उसके कानों में गूँजती रहती।सास (सख्त लहजे में) बोली - ऑफिस जाना है तो ये बात दिमाग़ में रखना—संस्कृति चुपचाप साड़ी की पल्लू ठीक करती।सास बोली - साड़ी पहनकर जाना।ज्यादा मेकअप नहीं।लिपस्टिक हल्की।बाल खुले नहीं रहने चाहिए।संस्कृति ने सिर हिला दिया।सास बोली - किसी से ज़्यादा बात नहीं करोगी। खासतौर पर मर्दों से।एक और नियम।सास बोली - हँसना नहीं है। ऑफिस घूमने की जगह नहीं है।संस्कृति का दिल और सिकुड़ गया।लेकिन