दीये की लौ

  • 300
  • 75

गाँव के आख़िरी छोर पर एक छोटा-सा कच्चा घर था, जहाँ मीरा अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहती थी। घर में न ज़्यादा सामान था, न सुख सुविधा, पर एक चीज़ भरपूर थी—संवेदनशीलता। मीरा रोज़ सुबह सूरज उगने से पहले उठ जाती थी, माँ के पैरों में तेल लगाती और फिर पास के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने चली जाया करती थी । तनख़्वाह बहत ज्यादा  नहीं थी कम ही थी, पर आत्मसम्मान बहुत बड़ा था उसका ।मीरा के पिता का देहांत बहुत साल पहले ही हो चुका था। उस दिन के बाद से मीरा ने कभी अपने आँसुओं को खुलकर