सौदे का सिन्दूर

हॉस्पिटल में आईसीयू के बाहर की हवा भारी थी, जिसमें फिनाइल की तीखी गंध और वेंटिलेटर की 'बीप-बीप' करती डरावनी आवाज़ मिली हुई थी। सान्वी वर्मा के हाथ में पकड़ा हुआ वह बीस लाख का चेक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी आज़ादी का मृत्यु-प्रमाणपत्र था।कांच के दरवाजे के उस पार, उसकी माँ, सुमित्रा, मौत से लड़ रही थीं। डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया था— 'एडवांस एक्यूट हार्ट फेलियर'। उनके दिल के वाल्व बदलने की ज़रुरत थी और फेफड़ों में पानी भर जाने से हालत नाजुक थी। अगर अगले दो घंटों में सर्जरी शुरू नहीं हुई, तो सान्वी अपनी दुनिया