"कभी-कभी इंसान अपनी मौत नहीं चाहता... वो सिर्फ अपने बोझ से आज़ादी चाहता है।" रात का वक्त था। उज्जैन जंक्शन का प्लेटफॉर्म लगभग खाली था। सिर्फ एक बेंच पर अमृत बैठा था, अकेला। उसकी आँखों में वो थकान थी जो सिर्फ हार से नहीं, लगातार हारने की आदत से आती है। उसके पास एक पुराना बैग था — जिसमें न कपड़े थे, न कोई सपना, सिर्फ कुछ कागज़ थे — बैंक नोटिस, कोर्ट समन, और उधार की पर्चियाँ। कभी इन्हीं पन्नों से वह अपने भविष्य का खाका बना रहा था, आज वही पन्ने उसके लिए मौत की पुकार बन