कांदेपोहे

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कांदेपोहेलेखक : राज फुलवरेशहर की भीड़भाड़ भरी जिंदगी में, जहाँ हर कोई अपनी जल्दी में, अपनी चिंताओं में डूबा हुआ भागता रहता है, उसी सड़क के एक कोने पर एक छोटी-सी गाड़ी रोज़ सुबह सज जाती थी।यह गाड़ी दूर से देखने में आम लगती थी, लेकिन उसके पास पहुँचते ही महसूस होता था कि यह जगह कुछ अलग है… इसमें एक अपनापन है, एक गर्माहट है।लोग उसे बड़े प्यार से “जुबेन होटल” कहते थे।नाम भले जुबेन हो, पर यह होटल से भी ज़्यादा घर जैसा लगता था।गाड़ी पर नीला-सा तिरपाल तना रहता। तिरपाल के नीचे गर्म-गर्म पोहे की खुशबू ऐसे