किराए की कोख - 1

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भाग: 1 — बाज़ार में ममताशहर की चकाचौंध से दूर, जहाँ ऊँची इमारतों का साया भी गरीबों की झुग्गियों को डराने आता था, वहाँ शांति का एक छोटा सा कमरा था। कमरा क्या, ईंटों का एक ऐसा संदूक जिसमें चार लोग साँसें ले रहे थे। शांति, उसका पति मदन, और उनके दो बच्चे। हवा में सीलन और गरीबी की वह खास गंध थी जिसे मंटो अक्सर 'इंसानियत के सड़ने की महक' कहा करते थे।मदन पिछले छह महीने से घर बैठा था। उसकी फैक्ट्री बंद हो गई थी और अब उसकी मर्दानगी केवल शराब की बोतलों और शांति पर चिल्लाने तक