स्मृतियों की खाट

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दरवाज़े के बगल में रखी पुरानी सी खाट पर बैठकर हरिप्रसाद जी हर सुबह चाय की चुस्कियों के साथ सूरज को निकलते देखते, और शाम को उसी सूरज के पीछे छिपती उम्मीदें |कभी यही खाट आँगन में होती थी..जहाँ उनके चारों बेटे-बेटियाँ बचपन में उनसे लिपटकर कहानियाँ सुनते थे।अब वही खाट एक कोने में खिसका दी गई थी, जैसे कोई चीज़ जो जगह तो घेरती है पर ज़रूरी नहीं लगती |हरिप्रसाद जी अब 78 के हो चले थे |शरीर झुक गया था, लेकिन स्मृतियाँ सीधी खड़ी थीं |वो यादें जब बेटे की फीस भरने के लिए उन्होंने अपनी घड़ी बेच