ईमानदार की विदाई

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"देखो भाई, इस देश में बेईमान को जेल भेजने का रिवाज पुराना हो गया है, अब हम ईमानदार को विदा करने की परंपरा डाल रहे हैं।"यह शब्द हमारे दफ्तर के बड़े बाबू, खन्ना जी के थे। अवसर था—मिश्र जी की विदाई का। मिश्र जी, जो पिछले तीस सालों से इसी दफ्तर की एक ऐसी कुर्सी पर चिपके थे, जिसे हिलाने की हिम्मत तो दूर, साफ करने की जहमत भी किसी ने नहीं उठाई थी। मिश्र जी 'ईमानदार' थे। और ईमानदारी इस दौर में वैसी ही बीमारी मानी जाती है, जैसे किसी अच्छे-भले आदमी को बीच बाजार में दौरे पड़ने लगें।विदाई