कोई फर्क नहीं पड़तावो कॉलेज की पुरानी, घिसी-पिटी सीढ़ियों पर बैठी रहती, घुटनों को सीने से चिपकाए। नीचे, ग्राउंड में हंसी का शोर था – वो लोग, जो कभी उसके साथ घंटों गप्पें मारते थे। अब वे फोन में उलझे रहते, किसी ग्रुप चैट में, किसी नई स्टोरी में। "अरे, देखो ये मेमे! हाहाहा!" कोई चिल्लाता, और बाकी सब हंस पड़ते। वो देखती रहती, जैसे एक सायबॉर्ग हो – मौजूद, लेकिन नजरअंदाज।उसका नाम था नेहा।साधारण नाम, साधारण जिंदगी।दूसरे साल की स्टूडेंट, आर्ट्स की।उसकी डायरी में लिखा रहता – "आज फिर वही। लोग हैं, लेकिन मैं नहीं।"नेहा को हमेशा यही लगता।