कहीं कोई रास्ता न दिखे फिर भी रास्ता तो निकालना ही पड़ता है। सारे लोग एक दुसरे का मुंह ताकने लगते हैं मगर उसी में से एक आदमी आगे बढ़ता है और वो भी अकेला। शारिरिक और मानसिक सहायता तो बहुत दुर की बात है, उत्साहवर्द्धन करने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता है।सहयोग वर्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ है। शारिरिक और आर्थिक मदद के बदले उसको मजाक का पात्र बनना पड़ा। बड़बड़ाया तो उसने अपने आप में ही था ’’ बेटा सहयोग, कोई नहीं करेगा तुम्हारा सहयोग, बल्कि होगा असहयोग। ’’धीरे से खुद में ही कही