शीर्षक: ज़िंदगी उधार नहीं होतीराहुल के घर में हर सुबह डर के साथ शुरू होती थी।डर इस बात का नहीं कि वह बीमार है—डर इस बात का था कि समय उसके साथ ईमानदार नहीं है।डॉक्टर की रिपोर्ट कह चुकी थी—“कुछ साल… शायद उससे भी कम।”उसके माता-पिता हर रात एक ही बात दोहराते—“शादी कर लो राहुल।”उनकी आँखों में ममता थी,लेकिन उस ममता के पीछे एक डर छिपा था—बुढ़ापे का अकेलापन।वे चाहते थे कि राहुल की पत्नी एक बच्चा दे,ताकि उनके बाद भी उनका जीवन किसी सहारे से चलता रहे।लेकिन राहुल हर बार चुप हो जाता।क्योंकि वह जानता था—अपनी अधूरी उम्र किसी