सुबह के चार बजे थे। घर गहरी नींद में डूबा हुआ था, पर उसके भीतर की चेतना पहले ही जाग चुकी थी। यह जागरण किसी आदेश का परिणाम नहीं था, न ही किसी अपेक्षा का बोझ। यह उन वर्षों की देन था, जिनमें उसने अपने शरीर को समय से पहले उठना सिखा दिया था—इस विश्वास के साथ कि अगर वह देर करेगी, तो दिन उससे आगे निकल जाएगा। रसोई में जलती बत्ती किसी दीपक की तरह नहीं, बल्कि एक संकेत की तरह थी—कि घर का संचालन शुरू हो चुका है। आटे की लोई, उबलता दूध, टिफ़िन के डिब्बे—ये सब अब