चंदेला — भाग 3लेखक: राज फुलवरेतीसरा पाठ — प्रकाश की जिम्मेदारीकांता अब केवल एक नाम नहीं रही थी। वह एक प्रतीक बन चुकी थी — एक ऐसी लौ, जो अंधेरे में उगी थी और आँधियों के बावजूद बुझी नहीं। जिस गाँव ने कभी उसे चुड़ैल कहा था, वही गाँव अब उसे आदर और भय के मिले-जुले भाव से “चंदेला” कहकर पुकारता था। यह नाम अब किसी औरत का नहीं, एक विचार का था — सच का, साहस का, और जिम्मेदारी का।पर कांता यह भी जानती थी कि सच का सामने आ जाना ही लड़ाई का अंत नहीं होता। सच के