जबलपुर की शांत गलियों में पली-बढ़ी आराध्या त्रिपाठी के सपनों में एक ही तस्वीर थी—सफेद एप्रन, स्टेथोस्कोप और एक डॉक्टर बनने का आत्मविश्वास।बारहवीं के बाद उसने पूरे मन से NEET दिया, पर किस्मत ने बस दो-चार अंकों की दूरी रख दी ,सपना टूटा नहीं था, बस थोड़ा ठिठक गया था।माँ-बाप दोनों शिक्षक थे—समझदार भी, समर्थ भी, उन्होंने बेटी की आँखों में उम्मीद देखी और फैसला किया ,एक साल ड्रॉप, और कोटा।कोटा…जहाँ हर सुबह अलार्म नहीं, सपने जगाते हैं।कोचिंग, हॉस्टल, नोट्स, टेस्ट—आराध्या उसी लय में ढल गई, पढ़ाई में अच्छी थी, और खूबसूरती ऐसी कि नज़र ठहर जाए—पर उसे इससे कोई