खामोशी के बाद

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“खामोशी के बाद”हाय…मैं रीना हूँ।आज जब मैं यह सब लिख रही हूँ, मेरी उम्र चालीस के पार है। बाहर से देखने वाला कहेगा—एक पढ़ी-लिखी, सभ्य, आत्मनिर्भर औरत।लेकिन भीतर… भीतर मैं एक ऐसे कमरे में बंद हूँ, जिसकी खिड़कियाँ सालों पहले किसी ने तोड़ दी थीं।अकेलापन आज मुझे नहीं मिला।वह तो उसी रात ने मुझे सौंप दिया था—जब मैंने खुद से बोलना छोड़ दिया था।मैं अपने माँ-पापा की इकलौती संतान थी। अमीर, खुले विचारों वाले, आत्मविश्वास से भरे लोग।माँ कहती थीं—“रीना, डरना मत। डर इंसान को जीते-जी मार देता है।”पापा हँसकर जोड़ते—“और अगर कभी लगे कि दुनिया गलत है, तो याद