वेदान्त 2.0 भाग 22अध्याय.31 ज्ञान योग की मूल धारा यह नहीं है कि अधिक जान लिया जाए, बल्कि यह देख लिया जाए कि जानने वाला कौन है।ज्ञान का अर्थ शास्त्र नहीं है, दुनिया का ज्ञान भी नहीं है। ज्ञान का अर्थ है — समझ।और वह समझ केवल एक बिंदु पर सिमट जाती है: “मैं कौन हूँ?”इतना ज्ञान पर्याप्त है। एक प्रश्न — और वही अंतिम प्रश्न।ध्यान को समझने के लिए भी यह समझ आवश्यक है। बिना ज्ञान के ध्यान केवल एक अभ्यास बन जाता है, गंभीरता आती है, पर सत्य नहीं।भक्ति में भी अगर समझ नहीं है, तो भक्ति अंधी है।