मदन मंजिरी

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मदन मंजिरी एक ऐसी कहानी… जो दर्द से शुरू होकर किस्मत की मोड़ पर जाकर बदल जाती है…गाँव “निमगाव” की कच्ची गलियों में सुबह की धूप ऐसे उतर रही थी, जैसे किसी ने सुनहरी चादर बिछा दी हो।गाँव छोटा था, पर उसमें धड़कनें बहुत थीं — और उन्हीं धड़कनों के बीच दो दिल बचपन से साथ धड़कते चले आ रहे थे…मदन और मंजिरी।दोनों एक-दूसरे के घर के इतने पास रहते थे कि घरों की छतों के बीच से आवाज़ें भी आसानी से पहुँच जाती थीं।बचपन से स्कूल साथ, रास्ता साथ, हँसना साथ… बस एक चीज़ नहीं पता थी—कि उनकी धड़कनें भी