अध्याय 9— जीवन और ईश्वर की मौलिक यात्रा मनुष्य अनगिनत जन्मों से जीवन के पथ पर चल रहा है — प्रयासों की अंतहीन श्रृंखला में बंधा हुआ। वह भोग, साधन और उपलब्धियों के पीछे भागता रहा, पर जीवन को स्वयं कभी जी नहीं पाया। उसकी साधना भी एक वासना थी — उपासना, प्रार्थना, ध्यान — सब किसी फल की आकांक्षा में रचे उपाय। और जहाँ आकांक्षा है, वहाँ मौलिकता मर जाती है। जीवन की असली मौलिकता जीने में है। जीवन को न साधन बनाना, न साधना; बस उसके सहज स्वभाव में प्रवेश करना