बचपन के खेल

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बचपन के खेल: आंसुओं की गलियांविजय शर्मा एरी(शब्द संख्या: लगभग १५००)सूरज की पहली किरण जब गांव की मिट्टी को चूमती, तो मेरा दिल धड़क उठता। मैं, छोटू, अपनी उस पुरानी साइकिल पर सवार, जिसके हैंडल पर मां की आखिरी सिलाई अभी भी चमकती थी। मां चली गई थीं जब मैं सात का था – बुखार ने छीन लिया। वह साइकिल उनकी याद थी, जंग लगी चेन में उनकी कोमल उंगलियों की थिरकन महसूस होती। हरिपुर का वह गांव, जहां खेत हरे, नदी गाती, लेकिन मेरे अंदर एक खालीपन सदा रहता। फिर भी, खेल... बचपन के खेल ही थे जो मुझे