सुबह का अंधेरा जब धुंध में घिरा होता है, तब किसी चौराहे पर रखी डिबिया की हल्की-सी रोशनी चारों ओर जीवन का आभास दिलाती है। नींद से बोझिल आंखे,और उबासी लिए लोग उसी रोशनी की ओर खींचे चले आते हैं। वहाँ उन्हें जो खींच लाता है, वह सिर्फ रौशनी नहीं बल्कि “चाय” की खुशबू है।हमारे यहाँ चाय केवल एक पेय पदार्थ नहीं, बल्कि एक भावना है। यह ऐसा एहसास है जो गले से उतरते ही सुकून दे जाता है। चाय वह डोर है जो परिवारों को जोड़ती है—सुबह की शुरुआत से लेकर शाम की थकान तक। यह मेहमानों को थोड़ी