त्रिशूलगढ़: काल का अभिशाप - 7

पिछली बार:अनिरुद्ध ने संज्ञा वन में अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार कर लिया था और पहली बार अपने असली सामर्थ्य को पहचाना।लेकिन अब उसके सामने दर्पण था  जिसमें कैद वही रहस्यमयी स्त्री दिखाई दी, जो शुरू से उसे पुकार रही थी।भविष्य की परछाईं ने कहा था  अगर इसे तोड़ोगे तो रास्ता बदल जाएगा।अब आगे:जंगल की ठंडी हवा भारी हो गई थी।अनिरुद्ध के सामने दर्पण चमक रहा था, उसमें उसकी ही परछाईं और उस स्त्री की थकी, डरी हुई आँखें झलक रही थीं।मैं क्या करूँ उसने तलवार कसकर पकड़ी।उसके भीतर द्वंद्व था।दिल कह रहा था  तोड़ दे, उसे बचा ले।दिमाग चिल्ला रहा