दशानन की पीड़ा

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लंका का आकाश धुएँ से भर चुका था। अशोक वाटिका जलकर राख हो रही थी, और हवाओं में जलते वृक्षों की गंध तैर रही थी। सोने की लंका, जिसे रावण ने अपनी शक्ति और बुद्धिमत्ता से संजोया था, आज विनाश की आहट से काँप रही थी। रावण अपने महल की सबसे ऊँची मीनार पर अकेला खड़ा यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में क्रोध था, परंतु कहीं भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी। यह वही लंका थी, जिसका वह अभिमान करता था, पर आज उसे पहली बार यह वैभव व्यर्थ लगने लगा था। "स्वामी, क्या आप चिंतित हैं?" पीछे से