"अति सर्वत्र वर्जिते " आज कुछ ऐसी औरतों की बात करनी है जो करती है कुछ ज्यादा। हांजी अपनी पहुंच से, अपनी मर्यादाओं से, अपनी क्षमताओं से कुछ ज्यादा। और फिर पछताती है, परेशान होती है, दुखी होती है वह भी कुछ ज्यादा।कभी कभी जिंदगी हमे बहुत उलझी सी लगती है। मन में हर तरह की उधेड़बुन चलती है। सब कुछ सही होते हुए भी कुछ सही नहीं लगता। रह रह कर एक ही बात ज़हन में आती है कि मैने किसीका क्या बिगाड़ा था जो यह मेरे साथ हुआ। मैं तो सब अच्छा कर रही थी फिर मेरे साथ