दोहा- श्री गणपति मंगल करण हरण अमंगल मूल । मंगल मूरति मोहि पर रहहु सदा अनुकूल ॥१॥ संवत सर श्रुति खंड विधु कार्तिक शुभ सित पक्ष । छठि मंगल बलदेव कृत हनुमत विनय प्रत्यक्ष ॥२॥( दोहे के अनुसार इस कृति का रचना काल है: कार्तिक शुक्ल ६ संवत् १९४१) अथ रुद्राष्टपदी सवैया जो परते पर, कारण हूँ कर-कारण केवल, कोउ न जाना । एक अनीह अरूप अनाम अजी ! सत चेतन आनन्द माना!व्यापक विश्व-स्वरूप अखण्डित,भक्तन हेतु सोई भगवाना ।देह अनेक धरें जग में, बलदेव सो रुद्र नमो हनुमाना ॥१॥