संत श्री साईं बाबा - अध्याय 16-17

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पूर्व विषयगत अध्याय में श्री चोलकर का अल्प संकल्प किस प्रकार पूर्णतः फलीभूत हुआ, इसका वर्णन किया गया है। उस कथा में श्री साईबाबा ने दर्शाया था कि प्रेम तथा भक्तिपूर्वक अर्पित की हुई तुच्छ वस्तु भी वे सहर्ष स्वीकार कर लेते थे, परन्तु यदि वह अहंकारसहित भेंट की गई तो वह अस्वीकृत कर दी जाती थी। पूर्ण सच्चिदानंद होने के कारण वे बाह्य आचारविचारों को विशेष महत्व न देते थे और विनम्रता और आदरसहित भेंट की गई वस्तु का स्वागत करते थे।यथार्थ में देखा जाए तो सद्गुरु साईबाबा से अधिक दयालु और हितैषी दूसरा इस संसार में कौन हो